Legal Rights of Wife: स्त्री धन से लेकर बच्चे की कस्टडी तक, शादीशुदा महिलाओं को मिले ये महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार

Legal Rights of Wife: भारत में विवाहित महिलाओं के लिए कानूनी सुरक्षा का कवच उन्हें विभिन्न अधिकार प्रदान करता है, जिससे वे समाज में सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें। चाहे वो स्त्रीधन का अधिकार हो, घरेलू हिंसा से सुरक्षा, या बच्चों की कस्टडी, भारतीय कानून महिलाओं को उनकी सुरक्षा और सम्मान की गारंटी देता है।

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Legal Rights of Wife: स्त्री धन से लेकर बच्चे की कस्टडी तक, शादीशुदा महिलाओं को मिले ये महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार
Legal Rights of Wife: स्त्री धन से लेकर बच्चे की कस्टडी तक, शादीशुदा महिलाओं को मिले ये महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार

भारतीय संविधान और विधायिका समय-समय पर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और सशक्तिकरण के लिए नए कानून लाते हैं और मौजूदा कानूनों में संशोधन करते हैं। इसमें घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 भी शामिल है, जो महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाव का अधिकार देता है।

हिन्दू पत्नियों को मिलने वाले क़ानूनी अधिकार

  1. स्त्री धन पर अधिकार (Right to Stree Dhan): हिन्दू विवाह अधीनियम के तहत, एक महिला को शादी के समय मिले जेवरात और पैसों पर पूरा हक होता है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि विवाह के दौरान महिलाओं को मिली संपत्ति पर उनका पूरा अधिकार रहे, भले ही वो संपत्ति पति या ससुराल वालों के पास क्यों न हो।
  2. घर का अधिकार (Right to Matrimonial Home): पत्नी को उस घर में रहने का अधिकार होता है जिसमें उसका पति रहता है, चाहे वह घर पुश्तैनी हो, खरीदा गया हो, या किराए का। इससे महिला को सुरक्षा का एहसास होता है और वह घरेलू मामलों में अपनी आवाज उठा सकती है।
  3. रिश्ते में प्रतिबद्धता का अधिकार (Right to Commitment in Relationship): भारतीय दंड संहिता के तहत, एक पति अपनी पत्नी से तलाक लिए बिना किसी और से विवाह या रिश्ता नहीं बना सकता। यह अधिकार महिलाओं को विश्वासघात से बचाता है और उन्हें वैवाहिक वफादारी की उम्मीद करने का आधार देता है।
  4. भरण-पोषण का अधिकार (Right to Maintenance): हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधीनियम के अनुसार, एक पत्नी अपने पति से जीवन भर भरण-पोषण की हकदार होती है। यहां तक कि तलाक के बाद भी वह एलिमनी पाने की अधिकारी होती है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
  5. बच्चे की कस्टडी का अधिकार (Right to Child’s Custody): अगर पति-पत्नी अलग हो जाते हैं, तो नाबालिग बच्चे की कस्टडी मां को प्राथमिकता से मिलती है। इससे सुनिश्चित होता है कि बच्चे की परवरिश और देखभाल उसकी मां के द्वारा की जा सके, जिससे बच्चे की भावनात्मक और शारीरिक सुरक्षा सुनिश्चित हो।

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