माँ- बाप के घर पर जबरन कब्जा करने वाले बेटे को बेदखल नहीं कर सकते, कोर्ट का आदेश

माँ- बाप के घर: पटना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस फैसले के अनुसार, अगर कोई बेटा अपने माता-पिता की संपत्ति पर जबरन कब्जा करता है, तो उसे वरिष्ठ नागरिक संरक्षण कानून के तहत बेदखल नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने कानूनी दुनिया में नई चर्चा को जन्म दिया है।

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कोर्ट ने कहा माँ- बाप के घर पर जबरन कब्जा करने वाले बेटे को बेदखल नहीं कर सकते, लेकिन बेटे को करना होगा ये काम
बाप के घर पर जबरन कब्जा करने वाले बेटे को बेदखल नहीं कर सकते

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार के पटना जिले का है। रविशंकर नाम के एक व्यक्ति ने अपनी मां-बाप के घर पर जबरन कब्जा कर लिया था। उनकी मां-बाप ने उन्हें घर से निकालने के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दिया था।

ज़िला मजिस्ट्रेट ने रविशंकर को घर खाली करने का आदेश दिया था। लेकिन, रविशंकर ने आदेश का पालन नहीं किया। इसके बाद, मां-बाप ने वरिष्ठ नागरिक संरक्षण कानून के तहत हाई कोर्ट में अपील की थी।

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किराये का निर्धारण

कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि बागी बेटे को उस संपत्ति का मासिक किराया देना होगा, जिस पर उसने जबरन कब्जा किया है। यह किराया उस संपत्ति के तीन कमरों का होगा और इसे नियमित रूप से भुगतान करने का आदेश दिया गया है। यह कदम माता-पिता के अधिकारों की रक्षा और उनके वृद्धावस्था में आर्थिक सहायता प्रदान करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।

फैसले का हल

माता-पिता की संपत्ति पर जबरन कब्जा करने वाले बेटे को बेदखल करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनके पास रहने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं है। अगर उनके पास रहने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं है, तो उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि रविशंकर को जबरन कब्जे के तहत उस संपत्ति का मासिक किराया एवं मासिक भरण-पोषण अपनी मां-बाप को देना होगा। यह किराया और भरण-पोषण उनकी मां-बाप की ज़रूरतों के हिसाब से तय किया जाएगा।

इस फैसले से माता-पिता के अधिकारों को मज़बूती मिली है। इससे ऐसे बेटों को रोका जा सकेगा जो माता-पिता की संपत्ति पर जबरन कब्जा कर लेते हैं।

निष्कर्ष और महत्व

यह फैसला न सिर्फ वरिष्ठ नागरिकों के हकों की रक्षा करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि कानूनी प्रक्रिया में माता-पिता और बच्चों के बीच संपत्ति विवाद को संवेदनशीलता के साथ संभाला जाना चाहिए। इससे भारतीय कानूनी प्रणाली में वरिष्ठ नागरिकों के हकों और उनकी सुरक्षा को लेकर नई दिशा मिलती है।

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